मचा हाहाकार: सवर्ण आरक्षण के खिलाफ 22 भाजपा विधायकों ने दिया पार्टी से इस्तीफा

जैसे-जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं, वैसे-वैसे मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन की कवायदों का गुब्बार फूटता जा रहा है भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की परेशानियां लगातार बढ़ती जा रही है. अब केंद्र और असम की सत्ता में भाजपा की साझीदार असम गण परिषद ने एनडीए से नाता तोड़ लिया है, असम गण परिषद (एजीपी) ने नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर सोमवार को असम की भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है।

एजीपी अध्यक्ष और मंत्री अतुल बोरा ने यह जानकारी दी। यह विधेयक बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के गैर मुस्लिमों को भारत की नागरिकता देने के लिए लाया गया है, बोरा ने कहा कि एजीपी के एक प्रतिनिधिमंडल ने नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी, इसके बाद यह निर्णय लिया गया।

गृहमंत्री से मुलाकात के बाद बोरा ने कहा, हमने इस विधेयक को पारित नहीं कराने के लिए केंद्र को मनाने के लिए आज आखिरी कोशिश की लेकिन गृहमंत्री ने हमसे स्पष्ट कहा कि यह लोकसभा में कल (मंगलवार) पारित कराया जाएगा। इसके बाद, गठबंधन में बने रहने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है।

इससे पहले एजीपी के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने बयान दिया था कि अगर नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 लोकसभा में पारित होता है तो उनकी पार्टी सरकार से समर्थन वापस ले लेगी यह विधेयक नागरिकता कानून 1955 में संशोधन के लिए लाया गया है।

यह विधेयक कानून बनने के बाद, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को 12 साल के बजाय छह साल भारत में गुजारने पर और बिना किसी उचित दस्तावेजों के भी भारतीय नागरिकता मिल सकेगी।

अब उम्मीद जताई जा रही है कि असम गण परिषद अब कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए का हिस्सा बन सकती है, असम गण परिषद के वरिष्ठ नेताओं ने ऐसे ही संकेत दिए है।

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