राफेल डील में नया खुलासा: पीएम मोदी के हस्‍तक्षेप के मिले सबूत, मनोहर पर्रिकर को थी जानकारी

बहुचर्चित एवं विवादित राफेल विमान सौदे को लेकर घिरी मोदी सरकार की मुश्किलें अब और बढ़ती हुई नजर आ रही हैं. दरअसल इस मुद्दे को लेकर अब एक और बड़ा खुलासा हुआ है इससे मोदी सरकार बैकफूट पर आ गई है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार फ्रांस की कंपनी के साथ हो रही इस रक्षा समझौते को लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा रक्षा मंत्रालय के सुझावों को नजरअंदाज किया गया था. रक्षा मंत्रालय के सुझाव को दरकिनार करके ही समानांतर बातचीत का जरिया अपनाया गया था.

इसमें सबसे खास बात यह है कि पीएमओ के इस कदम पर रक्षा मंत्रालय ने कड़ा विरोध भी जाहिर किया था और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इसे लेकर तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को पूरी जानकारी दी लेकिन इसके बाद भी उन्होंने कोई ठोक कदम नही उठाया.

न्यूज़ एजेंसी द हिंदू में लिखे अपने लेख में वरिष्ठ पत्रकार एन राम ने यह दावा किया है कि 7.87 बिलयन पाउंड के इस राफेल सौदे में पीएमओ द्वारा फ्रांस के साथ समानांतर बातचीत के कदम पर रक्षा मंत्रालय ने सख्त आपत्ति व्यक्त की थी. लेकिन पीएमओ ने रक्षा मंत्रालय के विरोध को भी दरकिनार कर दिया.

वहीं पीएमओ के समानांतर बातचीत के कदम के चलते ही यह सौदा इतना महंगा हो गया. यह लेख एन राम ने 24 नवंबर 2015 को रक्षा मंत्रालय द्वारा लिखी गई एक चिट्ठी का हवाला देकर लिखा है. इस चिट्ठी में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर को सौदे में पीएमओ द्वारा हस्तक्षेप करने की जानकारी दी गई थी.

मनोहर पर्रीकर को रक्षा मंत्रालय द्वारा लिखी गई चिट्ठी में में कहा गया है कि हम पीएमओ को सुझाव दे सकते हैं कि जो भी अधिकारी भारतीय वर्ता समूह का हिस्सा नहीं है वह राफेल सौदे के संबंध में फ्रांस के अधिकारियों से कोई बातचीत न करे.

चिठ्ठी में आगे कहा गया था कि अगर किसी कारण वश पीएमओ को इस सौदे में रक्षा मंत्रालय द्वारा की जा रही बातचीत में विश्वसनीयता का अभाव नजर आ रहा है तो वह नई रूप-रेखा के साथ बातचीत को अपने स्तर पर आगे बढ़ाए. लेकिन पीएमओ द्वारा इस सुझाव को नजरअंदाज करते हुए समानांतर बातचीत का रास्ता अपनाया गया जिससे यह डील मंहगी हो गई.

आपको बता दें कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार द्वारा राफेल सौदे के मोल-भाव में पीएमओ की किसी भी तरह की भूमिका से साफ इनकार कर दिया गया था. सरकार ने कोर्ट में कहा था कि राफेल डील के लिए मोल-भाव में 7 सदस्यीय टीम शामिल थी और इसका नेतृत्व वायु सेना के डेप्युटी चीफ ने किया था.

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